हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, हज़रत आयतुल्लाह बहजत (र) ने बंदगी की हक़ीक़त को गुनाह छोड़ना बताया और इस बात पर ज़ोर दिया कि गुनाह छोड़ना विश्वास यानी दिल के अमल और शरीर के अंगों के अमल, दोनों में होना चाहिए।
हज़रत आयतुल्लाह बहजत (र) ने फ़रमाया:
“बंदगी की हक़ीक़त यह है कि इंसान अपने विश्वास, यानी दिल के अमल और शरीर के अंगों के अमल में गुनाह से बचे। गुनाह छोड़ना उस समय तक इंसान की स्थायी आदत नहीं बन सकता, जब तक वह हर स्थिति, हर समय और हर स्थान पर लगातार अपने कर्मों की निगरानी और अल्लाह की याद को बनाए न रखे।”
स्रोत: बरगी अज़ किताबे नफ़ीस, सुखनी अज़ महबूब, पेज 331
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